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नेपाल में मानव तस्करी: देह व्यापार का भारी भूचाल

भूकंप के बाद नेपाल अब मानव तस्करी की मार झेल रहा है

“बइनी, ओ बइनी, कस्तो छ?” (बहन, क्या हुआ?) उत्तर प्रदेश के सोनौली में भारत को नेपाल से अलगाती 66 फुट चौड़ी निर्जन पट्टी के एक किनारे पर टिन की बनी सीसीटीवी युक्त एक छोटी-सी खोली के भीतर से बैंगनी सलवार कमीज पहने एक लड़की आवाज देती है. वह जिसे पुकार रही है, वह लड़की नायलॉन के लाल कपड़े में है और उसकी आवाज को अनसुना किए हुए भारत की ओर भागी जा रही है. लड़की नेपाल के सशस्त्र पुलिस बल के हत्थे चढ़ जाती है. वे पूछते हैं, “कहां जा रही हो? क्यों?” वह कहती है कि उसे भारत में काम मिल गया है लेकिन नहीं पता कि कहां जाना है. बैंगनी कपड़ों वाली लड़की आनन-फानन एकाध कॉल करती है, उसे बताती है कि ऐसा कोई काम वहां नहीं है और उसे वापस उसके घर भेज देती है. वह फिर “ओ बइनी” की आवाज लगाने लग जाती है.

यह लड़की तो बच गई, लेकिन कई ऐसी लड़कियां हैं जो नेपाल से लगी सरहद को चुपके से पार कर जाती हैं. पिछले जून में पुलिस ने महाराजगंज के नौतनवा में एक पेड़ के खोखल में छुपी एक लड़की को पकड़ा था, जो सोनौली से कुछ ही किलोमीटर दूर है. स्थानीय मुखबिरों से मिली सूचना के बाद वे सवेरे से ही उसे भारत और नेपाल की सीमा पर घने जंगलों में खोज रहे थे. कभी झाड़िहिला रहे थे तो कभी लंबी घास को हटा रहे थे और लताओं के नीचे झांक रहे थे. तभी किसी ने टॉर्च जलाई और उस पर नजर पड़ी. वह किसी छोटे से जानवर की तरह अंधेरे में जमी पड़ी थी और उसका चेहरा बुरी तरह घायल था, जबकि उसकी कलाइयों पर रस्सियों के निशान थे. अपने ऊपर पड़ी रोशनी को वह नहीं झेल पाई और अचानक चीखने लगी.

महासंकट  शिकार पर यौन तस्कर
यह चीख एक ऐसे नुक्सान की है जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती. उसकी एक नहीं बल्कि दो त्रासदियां हैं, बिल्कुल अपने देश नेपाल की तरह, जहां 9,000 लोगों को मारने, 28,000 को घायल करने, 28 लाख लोगों को विस्थापित करने और छह लाख लोगों को बेघर करने वाले 7.8 पैमाने के भूकंप के दस हफ्ते बाद तक फैली तबाही का वह महज एक चेहरा हैः उसका गांव रामकोट मलबे में तब्दील हो चुका है, उसका घर खत्म हो चुका है और उसकी मां हमेशा के लिए इस मलबे में गुम हो चुकी है. यह कहानी हालांकि अभी अधूरी है. दसियों हजार महिलाओं की तरह वह भी इंसानी लोभ का शिकार बन चुकी है, जिन्हें उठाया गया, बेच दिया गया और दासता या वेश्यावृत्ति में धकेल दिया गया. उसका देश अब भी बिखरी हुई जिंदगी के टुकड़े समेटने में जुटा हुआ है. दुनिया भर में फैले पाप और बुराई के अदृश्य काले कोठरों में खींच ली गई एक और चीखती हुई मौजूदगी जैसा यह दृश्य है, जहां सारी पहचानें छीनकर, सामाजिक रिश्तों से मरहूम करके जिंदगी को गलाजत और बीमारियों के सहारे कटने को छोड़ दिया जाता है.

संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष की मानें तो नेपाल में बीस लाख औरतें और लड़कियां खास तौर से अरक्षित हालत में हैं. इनमें 14 लाख से ज्यादा भीड़ भरे शिविरों में जी रही हैं और करीब 28,000 लड़कियां ऐसी हैं जिन्होंने अपना परिवार गंवा दिया है और शोषण के गंभीर खतरे का सामना कर रही हैं. बीस हजार से ज्यादा औरतों और बच्चों को मुक्त कराने का दावा करने वाले संयुक्त राष्ट्र के साथ काम कर रहे एक अलाभकारी संगठन मैती नेपाल की अनुराधा कोइराला कहती हैं, “भारी विनाश के बाद पैदा हुई अस्थिरता के चलते अपराधियों को मानव तस्करी का मौका मिल जाता है और वे कमजोर लोगों को बंधक बना लेते हैं.” वे बताती हैं, “मानव तस्करी हथियारों और मादक पदार्थों के व्यापार से भी ज्यादा तेजी से बढ़ रही है. इसके बावजूद उन व्यापारों से उलट जो लोग यहां सेक्स और सस्ते श्रम के लिए मनुष्य को बेचते, खरीदते और इस्तेमाल करते हैं, वे दंड से बच जाते हैं. इस संकट से निपटने के लिए तुरंत कार्रवाई किए जाने और राजनैतिक इच्छाशक्ति की जरूरत है.”

नेपाल के लिए मानव तस्करी कोई नई बात नहीं है. अमेरिकी विदेश विभाग की सालाना मानव तस्करी रिपोर्ट (टीआइपी) कहती है कि हर साल कोई 15,000 लड़कियों को यहां बेचा जाता है. मानव तस्करी पर 3 एंजेल्स नेपाल नाम का एनजीओ चलाने वाले पोखरा के राजेंद्र गौतम कहते हैं, “भूकंप के बाद स्थिति बहुत विकट हो गई है. देश भर में आज रोजाना 40 से 50 लड़कियों को मुक्त कराया जा रहा है. पहले यह संख्या 12 थी.” पश्चिमी एशियाई देश और चीन इस बार तस्करी के नए ठिकानों के रूप में उभरे हैं. अब ऐसा नहीं है कि सिर्फ  शेरपा, तमांग, बादी या चेपांग जैसे गरीब जनजातीय समूहों से आने वाली गोरी चमड़ी और मंगोलियाई चेहरों वाली लड़कियों की तस्करी हो रही है. अब किसी को भी पकड़ा जा सकता है जिसकी उम्र 10 से 40 साल के बीच की हो.

भूकंप के बाद नेपाल की हालत अब भी नहीं सुधरी है. काठमांडू में ह्यूमन राइट्स ऐंड इक्वालिटी में अंतरराष्ट्रीय परामर्शदाता अर्चना तमांग कहती हैं, “अब भी लाशों के ढेर लगे हुए हैं. लगातार आ रहे झटके हमें सतर्क  किए रहते हैं. हमारा देश एक विशाल भयबोध में कैद होकर रह गया है.” वे बताती हैं कि यह स्थिति सिंधुपालचैक, गोरखा, धाडिंग या कावरे में कहीं ज्यादा बुरी है जहां के 90 फीसदी गांव तबाह हो चुके हैं. “लाखों लोग सिर्फ जी रहे हैं. उनके पास कोई विकल्प या सपना नहीं बचा है. वहां तस्कर ज्यादा सक्रिय हैं. जिन लोगों के लिए 500 रुपया खुशकिस्मती की बात है, उन्हें वे 20,000 रु. तक की पेशकश कर रहे हैं.” मानसून की बारिश में बाढ़ और भूस्खलन से बचने के लिए विस्थापित परिवार सुरक्षित ठिकानों और आजीविका की तलाश में आनन-फानन भाग रहे हैं. यही लोग तस्करों के आसान शिकार हैं.

आसान शिकार “सफेद बकरियों” का आना
“मैडम, कुछ सफेद बकरियां आ रही हैं. क्या आप छापा मारना चाहेंगी?” पहले तस्कर रह चुका बाबा, जो अब लड़कियों को छुड़ाने का काम करता है, विनीता को ऐसा कहते हुए भूकंप के तीसरे दिन सतर्क करता है. विनीता लखनऊ में तस्करी के खिलाफ अलायंस नई आशा नाम का एनजीओ चलाती हैं. वे बताती हैं, “जब राहत सामग्री नेपाल पहुंचनी शुरू हुई, कई परेशान मां-बाप अपने बच्चों को भारत ले जाने का आग्रह करने लगे, कुछ ने पैसे जमा कराने की भी बात कही.” इस मौके को सूंघते हुए कोठा मालिकों ने राहत सामग्री देकर तस्करों को वहां भेजना शुरू किया. वे बताती हैं, “भूकंप के कुछ दिनों के भीतर ही लखनऊ के कोठों में नेपाली लड़कियों की संख्या अचानक बढ़ गई.”

दिल्ली में जीबी रोड के कोठा नंबर 64 पर एक स्टिंग अभियान के दौरान तस्करी विरोधी संगठन शक्ति वाहिनी के ऋषिकांत को कुछ संदेह हुआ. यह भूकंप के तुरंत बाद की बात है. उनकी टीम को पता चला कि कोठा मालिक भूकंप पीड़ितों के लिए राहत सामग्री भिजवा रहा हैः चावल के बोरे, दालें, कपड़े. वे बताते हैं, “उस कोठे में सारी नेपाली लड़कियां हैं. वे लोग उनके तबाह हो चुके गांवों में राहत सामग्री लेकर जा रहे थे. पता नहीं उन्होंने ऐसा क्या कहा, लेकिन तबाही वाले इलाके में किसी युवा लड़की को फंसाना आसान हो सकता था.”

गुम जिंदगियां  बेहतर जिंदगी की फांस
उसे कभी नारायणी नाम की एक नदी का पता था जो भारत और नेपाल के बीच चांदी के चमकदार गोटे की तरह बहती थी. उसके किनारों पर लाल फूल होते थे, लहरों पर किंगफिशर तैरते और नीचे घडिय़ाल सोते थे. दूना की पहाडिय़ां विशाल ऊंचाई से इस खेल को निहारती रहती थीं. यह दृश्य 25 अप्रैल को ताश के पत्तों की तरह ढह गया. भूकंप के बाद मलबे में लोगों ने अपने-अपने तंबू गाड़ लिए और वह अपने परिवार के साथ वहां चली आई. जल्दी ही कुछ लोग वहां चक्कर काटने लगे. वे उससे प्यार से बात करते और बताते कि उसे गांव छोड़ देना चाहिए, क्योंकि बाहर की जिंदगी ज्यादा सुहानी है.

आखिरकार किसी ने उसे नशीली दवा खिला दी. शायद कोई पड़ोसी था. उसकी नींद खुली तो वह भारत की सरहद में एक कोठरी में बंद थी. उसे ऊपर की मंजिल पर रखा गया था. उसके हाथ बंधे हुए थे. उन्हें तभी खोला जाता जब उसका बलात्कार करना होता या फिर पीटा जाना होता था. ऐसा करने वाले पुरुषों में कुछ जानने वाले भी थे और कुछ अनजान भी. स्थानीय लोगों को किसी तरह इसकी खबर मिल गई. खतरा सूंघ कर वे लोग भाग गए और लड़की बाहर निकल आई. आज वह काठमांडू के एक “सेफ होम” में है और अपने अधिकारों के लिए लड़ रही है. उसने उन लोगों के खिलाफ मुकदमा किया है जिन्होंने उसकी तस्करी की थी. उसके पेट में बच्चा है और वह उसे पालना चाहती है. वह उसके लिए भी जंग लडऩे को तैयार है. सवाल बस इतना है कि क्या वह दोबारा कभी अपनी खिड़की से बाहर झांककर उस नदी को देख पाएगी.

एक तस्कर की कहानी सुनियोजित तंत्र

मानव तस्करी के दो मामलों में दोषी गहरे वर्ण का और चतुर निगाहों वाला मनोज जमानत पर बाहर आ चुका है. वह पूछता है, “मैं टैक्सी चलाता हूं. मुझे तस्करी के बारे में क्या पता?” उसे फिर पकड़ा क्यों गया? वह कहता है, “बदकिस्मती थी.” पहली बार इसलिए कि उसकी सवारियों में कुछ तस्कर थे और दूसरी बार इसलिए क्योंकि एक एनजीओ के कियोस्क पर कुछ लड़कियों ने गलती से उसकी ओर इशारा कर दिया. वह कहता है, “मैं तो साइकिल से सीमा पार कर रहा था.” उसे अच्छे से पता है कि लड़कियों को सीमा के पार कैसे लाया जाता है. इसमें पांच से छह लोगों की जरूरत होती है. एक आदमी लड़की को गांव से शहर लाता है. एक उसे सीमा तक ले जाता है. एक उसे सीमा से उठाता है. एक उसे बड़े शहर तक पहुंचाता है. वह कहता है, “मैंने यह सब सुना है. मैंने देखा है कि लड़कियां स्वेच्छा से आती हैं. उन्हें नौकरी चाहिए, पैसा चाहिए, वे बाहर जाकर शादी करना चाहती हैं.”

ऋषिकांत कहते हैं, “यह एक दुश्चक्र है.” मानव तस्करी की शुरुआत सामान्यतः गांव में आए किसी नए व्यक्ति से होती है. वह अक्सर ऐसा शख्स होता है जो शादीशुदा, शिक्षित और अच्छी नौकरी वाला हो. लोग उससे मिलते हैं, दूसरे शहरों या देशों में मौजूद अवसरों पर उसकी बातें सुनते हैं और अपनी लड़कियों के लिए अच्छी नौकरियों के प्रस्ताव पर बात करते हैं. नेपाल के राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग द्वारा जारी कैद तस्करों की रिपोर्ट के मुताबिक, अक्सर उनसे यह बात सुनने में आती है कि “मैंने लड़की को उससे प्यार करने के बहाने और अच्छी नौकरी दिलवाने के नाम पर फंसाया.” एक और बात वे कहते हैं, “मैंने उससे या उसके अभिभावकों से संपर्क करने से पहले उसके परिवार की माली हालत का जायजा ले लिया था.”

कोइराला कहती हैं, “लेकिन ये लोग तो तस्करी के तंत्र में सबसे निचले पायदान पर होते हैं और इन्हें सबसे कम पैसे मिलते हैं.” तस्कर जब किसी लड़की को गांव से बाहर लेकर जाता है तो उसकी मदद करने के लिए एक पूरा तंत्र होता है. कोइराला कताती हैं, “ड्राइवर को पता होता है. रास्ते में जिस गेस्टहाउस में वे रुकते हैं उन्हें पता होता है. सीमा पार करने से पहले लड़की के लिए जिन दुकानों से वे नए कपड़े खरीदते हैं, उन दुकानदारों को पता होता है. सीमा के उस पार भी यही चीजें काम करती हैं, जब तक कि वे अपने ठिकाने तक नहीं पहुंच जाते.” हर कदम पर लड़की के साथ एक नया आदमी होता है. “असली अपराधी वे हैं जो इस अपराध के प्रायोजक हैं. वे शायद ही कभी पकड़े जाते हों.”

सोनौली की सीमा चौकी पर अफरा-तफरी का मंजर हैः झोले लादे लड़कों का एक समूह कुछ दूरी पर खड़ा परेशान-सा दिख रहा है और मोबाइल फोन पर बात कर रहा है. एक एनजीओ के कियोस्क के सामने टोपी पहने और चश्मा लगाए एक शख्स किसी का इंतजार कर रहा है. उसके पीछे एक लड़की चुपचाप खड़ी है. चार लड़कियों को लिए हुए एक महिला आगे आती है. तमाम आवाजें एक साथ सुनी जा सकती हैः “हम भारत घूमने जाना चाहते हैं”, “मैं इसका अंकल हूं, इसके लिए मैंने एक नौकरी खोज रखी है”, “मैं अपनी बच्चियों के साथ खरीदारी करने भारत जा रही हूं.”

यह 1950 की एक संधि की देन है कि भारत और नेपाल के बीच 1,751 किलोमीटर लंबी मुक्त सीमा को कोई भी और कभी भी बिना पासपोर्ट के पार कर सकता है. भारत की उत्तरी सीमा की चौकीदारी करने वाले सशस्त्र सीमा बल के महानिदेशक बी.डी. शर्मा कहते हैं, “सीमा पर मानव तस्करी में भारी इजाफा हुआ है.” एसएसबी ने 2008 के बाद से नेपाल से तस्करी के शिकार जिन लोगों को छुड़ाया है और जितने तस्करों को पकड़ा है, उनमें क्रमशः 30 और 49 फीसदी सिर्फ पिछले दो महीनों की घटनाएं हैं. वे बताते हैं, “कुल 26 सीमा चौकियों में से दस उच्च खतरे वाले क्षेत्र हैं, जैसे उत्तर प्रदेश में सोनौली और बिहार में रक्सौल.” यहां सतर्कता बढ़ाने के लिए नेपाल के तस्करी विरोधी एनजीओ को जगह दी गई है. वे कहते हैं, “एनजीओ के कई कार्यकर्ता खुद तस्करी का शिकार रहे हैं, इसलिए वे मीलों दूर से संदिग्धों को सूंघ सकते हैं.”
सोनौली तस्करों के लिए बहुत मुफीद जगह है. यहां मची अफरा-तफरी के बीच अपराधी बिना पकड़ में आए चुपचाप निकल लेते हैं. भारतीय पुलिस के एसएचओ जितेंद्र यादव बताते हैं, “रोजाना करीब दस हजार लोग सीमा के पार आते-जाते हैं और 300 से ज्यादा ट्रक गुजरते हैं.” एक अनुमान के मुताबिक, नेपाली लोग सीमापार भारतीय बाजारों में रोजाना एक करोड़ रु. से ज्यादा की खरीदारी करते हैं.

शर्मा बताते हैं, “तस्कर आम तौर से छोटे वाहनों में सड़क मार्ग से यात्रा करते हैं.” उत्तर प्रदेश में सोनौली और बिहार में रक्सौल के बीच अच्छा संपर्क साधन है. नतीजतन, दोनों जगहें हर किस्म के तस्करों के लिए अहम केंद्र हैं, चाहे वे इंसानों के तस्कर हों या नशीली दवाओं के, नकली मुद्रा के और हथियारों के तस्कर. सोनौली पुलिस का लश्कर-ए-तय्यबा के बम बनाने वालों, इंडियन मुजाहिदीन के नेताओं और दाऊद इब्राहिम के गुर्गों के साथ मुठभेड़ का लंबा इतिहास रहा है. रक्सौल के भी अपने कुख्यात गिरोह हैं और वहां सोने से लेकर नारकोटिक्स, वर्जित माल और हथियारों की तस्करी होती रही है. इसे आइएसआइ के लोगों के लिए भी सुरक्षित ठिकाना माना जाता है.

बिना सुरक्षा वाले प्रवेश बिंदु
तस्करों के लिए डरने की खास वजह नहीं सोनौली में 3 एंजेल्स नेपाल नामक एनजीओ के प्रमुख दीपक भट्टा कहते हैं, “हम सिर्फ आधिकारिक प्रवेश द्वारों पर निगरानी रखते हैं लेकिन तस्कर अनधिकारिक प्रवेश व निकासी बिंदुओं का भी इस्तेमाल करते हैं. सोनौली के आसपास ऐसे 22 स्थान हैं जहां से तस्कर बच कर निकल सकते हैं.” भूकंप से पहले भट्टा की टीम रोजाना 5-6 लड़कियों को छुड़ाने का काम करती थी. आज यह संख्या पांच गुना हो गई है.

नेपाल से तस्करी पर शोध कर चुके राजस्थान विश्वविद्यालय के विनोद कुमार भारद्वाज बताते हैं, “एक ही रास्ते से बार-बार आने-जाने से संदेह पैदा हो सकता है. इसीलिए तस्कर सैलानियों वाले सीजन में आधिकारिक सीमा द्वारों का प्रयोग करते हैं जबकि बीच के वक्त में किसी सुदूर रास्ते का इस्तेमाल करते हैं जहां सुरक्षा इंतजाम न हों.” वे बताते हैं, “एक गिरोह औरतों और लड़कियों को शहरों में लाता है और दूसरे के सुपुर्द करता है.” कुछ लड़कियों को स्थानीय स्तर पर वेश्यावृत्ति में धकेल दिया जाता है और कुछ को बाहर भेज दिया जाता है.

भारत में तस्करी के रास्ते समय के साथ तय हो चुके हैं. पश्चिमी नेपाल से आने वाले सोनौली-महाराजगंज-गोरखपुर का रूट लेते हैं और यहां से कानपुर, लखनऊ, बनारस, आगरा, दिल्ली जैसे बड़े सेक्स बाजारों का रुख करते हैं. मध्य नेपाल से आने वाले जोगबनी और बिहार के रक्सौल का रास्ता लेते हैं जहां से वे पटना जाते हैं या फिर मुंबई जाने वाली जनसाधारण एक्सप्रेस पकड़ लेते हैं. पूर्वी नेपाल से आने वाले तस्कर ठाकुरगंज के आसपास इस पार आते हैं और वहां से सिलीगुड़ी, गुवाहाटी और शिलांग का रुख करते हैं. अपने शोधकार्य के अनुभवों के चलते भारद्वाज का मानना है कि “तस्करों को रास्ते में किसी चीज से खास डरने की जरूरत नहीं होती. यह काम सीमा के दोनों ओर सुरक्षा बलों की सहमति से चलता है.” आधी से ज्यादा लड़कियां स्थानीय सेक्स बाजारों का हिस्सा बन जाती हैं. बाकी दिल्ली, मुंबई, चेन्नै और कोलकाता चली जाती हैं. वहां से उन्हें भारत के किसी और शहर में भेजा जा सकता है या बाहर के देशों में भी, खासकर पश्चिम एशिया के देशों  में और मलेशिया भेजा जा सकता है.

अलायंस नई आशा में छापा मारने की कार्रवाई का नेतृत्व करने वाले आशीष श्रीवास्तव कहते हैं कि किसी तस्कर के लिए लड़की खरीदना महंगा सौदा होता है. वे बताते हैं, “एक लड़की के माता-पिता से दोस्ती गांठने में ही वे 10,000 से 15,000 रु. खर्च कर देते हैं ताकि उनका भरोसा जीत सकें और पैसे की चमक दिखाकर अच्छे जीवन के वादे में उन्हें यकीन दिला सकें.” इसके अलावा उन्हें राजी करने में बिचौलियों की भी भूमिका होती है, जिनमें हरेक को करीब 10,000 रु. मिलते हैं. सीमा पार करने के लिए उन्हें टैक्सी की जरूरत होती है. इसमें भी भरोसे वाला आदमी चाहिए होता है जो हर लड़की पर 3,000 से 5,000 रु. लेता है. इसके बाद तस्कर किसी कोठे पर इस लड़की को 50,000 से 75,000 रु. में बेचने की कोशिश करता है. वे बताते हैं कि पहले साल में वे ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाने की कोशिश करते हैं. वे कहते हैं, “यह बेरहम व्यवस्था है. एक लड़की का कामचलाऊ जीवन बहुत छोटा होता है. अगर वह मारपीट और गालियों से बच गई, एड्स की भेंट नहीं चढ़ी या मारी नहीं गई, तब जाकर बीस साल की उम्र के बाद वह खुद तस्कर बन सकती है.”

जाल और चाल नए तरीके, नए ठिकाने
सोनकलिया को रोकने वाली कोई सीमा नहीं बनी है. उससे आप कुछ भी पूछकर देखें, वह तुरंत अपने छह पहचान पत्र दिखा देगी. सारे इतने अलहदा हैं कि वह हर बार नई नजर आएगी. एक पहचान पत्र कहता है कि वह बनारस की फैशन परिधान वाली कंपनी विन-विन की कर्मचारी है. दूसरे में वह सामुदायिक रेडियो परिवर्तन 89 मेगाहर्ट्ज की पत्रकार है. एक तीसरा पहचान पत्र उसे कपिलवस्तु मल्टीपल कैंपस की छात्रा बताता है. उससे पूछिए कि विन-विन में वह क्या काम करती है जिससे उसे 27,000 रु. महीने की आय होती है, तो उसका जवाब होगा, “मैं ट्रेनिंग देती हूं.” कौन-सी ट्रेनिंग, किसे? वह दोहराती है, “मैं ट्रेनिंग देती हूं.” और उसके साथ चुपचाप खड़ी दूसरी लड़की कौन है? “ मेरी बहन है, गीता. मैं उसे विन-विन में नौकरी लगवाने लेकर जा रही हूं.” एक नजर में कोई भी पक्के तौर पर सोनकलिया के बारे में इतना ही बता सकता है कि वह झूठ बोल रही है.

तस्करों ने ऐसी पहचानों के लिए अब फैशन, मॉडलिंग, डांसबार, मसाज पार्लर, वयस्क मनोरंजन जैसे तमाम क्षेत्रों को पकड़ लिया है. सोनकलिया का विन-विन वाला जो फर्जी “प्रिविलेज कार्ड” है, उस पर न तो कोई पता है, न ही कोई विवरण. बस एक पंक्ति लिखी है, “वी आर द टीम.” एक एनजीओ की कार्यकर्ता माया की मानें तो सोनौली सीमा चौकी पर पकड़ी जाने वाली करीब 30 फीसदी लड़कियां कहती हैं कि वे विन-विन के लिए काम करती हैं. किसी को नहीं पता कि ये विन-विन वास्तव में क्या है. वे बताती हैं, “वे सभी कहती हैं कि वे बनारस में एक डॉरमिटरी में रहती हैं.” ऐसा लगता है कि इन्हें भारी तनख्वाहें मिलती हैं. अगर एक लड़की तीन और लड़कियों को ले जाने में कामयाब हो जाती है तो उसे कमिशन मिलता है. इस धंधे में हर नई रंगरूट को पंजीकरण कराने के लिए 25,000 रु. खर्च करने पड़ते हैं.

एक और अजीब मामला तब सामने आया जब नेपाल के सेंट्रल इन्वेस्टिगेशन ब्यूरो (सीआइबी) ने जून में काठमांडू के दस से ज्यादा तस्करों को गिरफ्तार किया. ये लोग डांस बारों के चक्कर लगा रहे थे और अपनी मॉडलिंग एजेंसियों के लिए फोटोशूट का बहाना बनाकर लड़कियों को बाहर ले जाने के लिए बहकाने में लगे थे. इनमें अधिकतर का पैसा पश्चिमी एशिया और अफ्रीका के डांस बारों में लगा हुआ था, जहां लड़कियों की तस्वीरें भेजी जा रही थीं और एक के बदले में 3,000 डॉलर की मांग की जा रही थी. सीआइबी ने पाया कि एक बार वहां पहुंचने के बाद इनके यात्रा दस्तावेजों को जब्त कर लिया जाता था और इन्हें वयस्क मनोरंजन तथा सेक्स के धंधे में धकेल दिया जाता था. कई को तो मारा-पीटा भी गया, अलग रख दिया गया और कैद कर दिया गया.

अब तस्करी का बाजार भी बदल रहा है. भारत अब मुख्य बाजार नहीं रहा. टीआइपीएस की रिपोर्ट कहती है कि भारी संख्या में लड़कियों को तस्करी करके पश्चिमी एशिया, मलेशिया, हांगकांग, दक्षिणी कोरिया, जापान और यहां तक कि अफ्रीका और स्वीडन तक भेजा जा रहा है. वयस्क मनोरंजन और यौन शोषण के एक अहम केंद्र के रूप में चीन उभरकर सामने आ रहा है. एक अन्य हालिया छापे में सीआइबी ने एक मैरेज ब्यूरो का भंडाफोड़ किया था, जो किशोरियों को अधेड़ चीनी पुरुषों के साथ “कागज पर शादी” करवाने के लिए फंसाता था. ये चीनी विदेशी दुलहन के लिए 15 से 25 लाख रु. चुकाने को तैयार थे. लड़कियों को बताया जाता था कि शादी तो बस नाम की है, जबकि उन्हें भारी वेतन पर एक कंपनी में काम करना होगा जिसकी मदद से जल्द ही वे अपने परिवार को चीन ले जा सकेंगी. जांच में पता चला कि काठमांडू के इर्दगिर्द ऐसे कम से कम 83 ब्यूरो काम कर रहे थे.

नियुक्ति और शिक्षा का फर्जीवाड़ा मानव तस्करों की नई चाल है. ऐसे सिलसिलेवार मामले सामने आए हैं जहां नेपाली छात्रों ने विदेशी विश्वविद्यालय में प्रवेश के लिए भारी धन चुकाया है और खुद को अंत में ऐसी खतरनाक स्थितियों में फंसा पाया जहां से निकलना असंभव था. मानव अंगों के व्यापार और वैश्विक आतंकी समूहों के इर्दगिर्द भी एक खतरनाक नेटवर्क  कायम हो रहा है. एशिया फाउंडेशन की रिपोर्ट है कि कावरे के गरीब ग्रामीणों की किडनी निकाल ली गई, जिसे करोड़ों रु. में चेन्नै और दिल्ली के काले बाजार में बेचा जाएगा. नेपाल की सीआइबी ने ऐसे गिरोह का पर्दाफाश किया है जो 7,000 डॉलर की दर से नेपाली औरतों को सेक्स और इंसानी ढाल के लिए सीरिया में खतरनाक इस्लामिक स्टेट मिलिशिया को बेचता था.

मासूमियत का अंत बच्चे भी नहीं बख्शे जा रहे
ललितपुर में कैफे आमू नाम का अपना रेस्तरां चलाने वाली अर्चना तमांग को काम के दौरान यह एहसास हुआ कि बच्चों को भी नहीं बख्शा जा रहा है. वे बताती हैं, “भूकंप के तुरंत बाद हमने एक अनाथालय में हर शनिवार खाना भेजने का फैसला किया.” कुछ हफ्तों में ही उनका ध्यान इस बात पर गया कि बच्चों की संख्या नाटकीय तरीके से घट-बढ़ रही है. उनके एक दोस्त हैं शशांक सादी, जो आपदा प्रबंधन के बांग्लादेशी विशेषज्ञ हैं. उनका भी यही निष्कर्ष था कि अपंजीकृत बालगृहों में ऐसा कुछ घट रहा है. सादी ने इस पर नेपाल के केंद्रीय बाल कल्याण बोर्ड से परामर्श किया. आज बच्चों को अनुमति या माता-पिता के बगैर कहीं ले जाने पर राष्ट्रव्यापी प्रतिबंध लग चुका है.

भूकंप से अस्सी लाख बच्चे प्रभावित हुए हैं. करीब साढ़े नौ लाख बच्चे या तो सड़कों पर हैं या फिर अस्थायी तंबुओं के भीतर हैं. कम से कम 245 को तस्करों के चंगुल से या बालगृहों के भीतर गैर-कानूनी रूप से रखे जाने से छुड़ाया जा चुका है. बच्चा गोद लेने या अनाथालयों में जाने में दिलचस्पी रखने वाले विदेशियों के प्रति यूनीसेफ ने “ऑर्फनेज वॉलन्टूरिज्म” की चिंता जाहिर की है. हाल ही में पुलिस ने तीन बच्चों को मुक्त कराया जिन्हें गोद लेने के नाम पर एक चीनी महिला सिंधुपालचौक से तस्करी करके पोखरा ले जा रही थी.

लंबी राह कई हितधारकों का सवाल

शक्ति वाहिनी के केंद्रीय गृह मंत्रालय को लिखे पत्र के बाद कुछ कार्रवाई हुई है. उत्तर प्रदेश के गृह विभाग ने सीमा पर सतर्कता बढ़ा दी है. तस्करों के लिए सीसीटीवी कैमरे लगाए गए, तस्कर निरोध इकाइयों को सक्रिय किया गया, पुलिस के लिए जागरूकता कार्यक्रम चलाए गए और ऐसे नेटवर्क का निर्माण किया गया जहां मानव तस्करी निरोधक सभी हितधारकों को इकट्ठा किया जा सके. उत्तर प्रदेश के गृह सचिव कमल सक्सेना कहते हैं, “हम कुछ समय से इस मसले पर काम कर रहे हैं और मुख्यमंत्री खुद इसमें निजी दिलचस्पी ले रहे हैं.” अभी और भी योजनाएं बाकी हैं. तस्करी निरोधक कानूनों पर छोटी लेकिन दमदार पहल से लेकर पीड़ितों के लिए पुनर्वास और कौशल विकास के प्रयास. सक्सेना ने बताया, “उत्तर प्रदेश आगे बढ़ चुका है, इसलिए अब तस्कर बिहार और बंगाल का रुख कर रहे हैं. हमारा मॉडल दूसरे राज्य भी अपना सकते हैं.”

नेपाल की संविधान सभा के सदस्य विश्वेंद्र पासवान कहते हैं, “अधिकतर तस्करों को हमारे नेताओं का संरक्षण प्राप्त है. वे हमारे राजनैतिक दलों और नौकरशाहों के लिए काम करते हैं और उनसे पोषित होते हैं. ऐसे में तस्करी की समस्या से निपटने में नेपाल क्या उम्मीद कर सकता है?” कोइराला का कहना है कि समस्या यह है कि इसमें कई हितधारक शामिल हैं. वे कहती हैं, “नेपाल की सरकार, गृह मंत्रालय, कानून मंत्रालय और न्यायपालिका शानदार काम कर रहे हैं. लेकिन जब तक महिला और समाज कल्याण मंत्रालय तथा विदेशी रोजगार मंत्रालय नहीं जुड़ जाते, खामियां दुरुस्त नहीं की जा सकेंगी.”

गोरखपुर परिक्षेत्र के पुलिस महानिरीक्षक अमिताभ यश कहते हैं, “अब गुटखा चबाने वाले अशिक्षित पुरुष-महिलाएं तस्कर नहीं रह गए हैं. वे सेलफोन लेकर चलते हैं, अंग्रेजी बोलते हैं और हो सकता है कि वे अपनी बिरादरी के सम्मानित जन हों.” इस बात के साक्ष्य हैं कि आज तस्कर सूचनाओं के आदान-प्रदान के लिए, दुनिया भर में पैसे और सेवाओं के तीव्र विनिमय के लिए स्मार्ट प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल कर रहे हैं. वे कहते हैं, “तकनीक भी समाधान का हिस्सा हो सकती है, खासकर बायोमीट्रिक्स, उंगलियों के निशान, रेटिना का स्कैन, आवाज-चेहरे की पहचान.” भारत का विशिष्ट पहचान प्राधिकरण इस साल देश के बाल गृहों के साथ बायोमीट्रिक्स प्रणाली की शुरुआत कर रहा है ताकि लापता बच्चों का पता लगाया जा सके और तस्करी और गैर-कानूनी तरीके से गोद लेने को रोका जा सके.

इस दौरान नेपाल से लड़कियां अब हवाई जहाज से बाहर जा रही हैं. इंटरपोल ने ऐसी  चेतावनी जारी की है. काठमांडू हवाई अड्डे पर जींस और छोटे टॉप पहने कुछ लड़कियां सुरक्षा जांच तक आती हैं. उनके कदमों में तेजी है, चेहरे पर मुस्कान है और हाथ में एयरएशिया के बोर्डिंग पास हैं. उनसे पूछिए कि वे कहां जा रही हैं, और वे एक साथ चहक उठती हैं, “मलेशिया.” क्यों? “हमें नौकरी मिल गई है.” उनसे कंपनी का नाम पूछिए तो वे एक दूसरे की ओर देखकर हकलाने लग जाती हैं, “प्रेसी… प्रेसे…!” फिर एक लड़की मामले को संभालती है, “वह मोबाइल पैकेजिंग कंपनी है.” हो सकता है ऐसा ही हो, लेकिन यकीन करना मुश्किल है.

Meeting of the Central Advisory Committee on Human Trafficking Convened on 3 September after NALSA Committee submits it Report.

mardaani01-jun24Supreme Court wants NALSA report on prevention, rescue and rehabilitation to be used as guiding document.

Observing that the problem was grave and something needed to be done urgently, the Supreme Court today asked the Centre to come out with an action plan to prevent trafficking of girls for sexual exploitation, their rescue and rehabilitation after holding discussions with all states.

The Centre has been asked to discuss the report of the National Legal Services Authority (NALSA) on prevention, rescue and rehabilitation of the victims of trafficking for commercial and sexual exploitation.

10609524_10152784314039123_1825989846660013043_nThe bench of Justices Anil R Dave, Madan B Lokur and Kurian Joseph gave the directions after hearing senior advocate Dushyant Dave, who sought urgent directions for the authorities saying that the problem is grave.

“We need to do something urgently, Dave told the bench representing NGO ‘Prajwala’. The NGO had had moved the court against the trafficking of girls and women for commercial sexual exploitation, also lauded the NALSA for its recommendations.

The court noted that the Central Advisory Committee was scheduled to deliberate on NALSA’s recommendations on September three and directed that the Chief Secretaries of all states and union territories must participate in it.

It also directed the Centre to place before it the minutes of the meeting and file an affidavit within three weeks after September 3 meeting elaborating the steps likely to be taken by it on each recommendation of NALSA which was lauded by all in the court.

2014_10image_13_13_483818000humantrafficking-llThe NALSA Report

The NALSA, in its report filed with the apex court, has suggested roles of various stakeholders in the prevention, rescue and rehabilitation of victims of trafficking for commercial and sexual exploitation. The report has sought a direction to the Centre that an organised crime investigation agency be set up to investigate the cases of human trafficking and organised crime.

The court may direct the setting up of a committee by the central government to work out the modalities of setting up such a specialised agency, it said. This court may direct that till such time an organised crime investigation agency is set up, the Anti Human Trafficking Unit (AHTU), which works under the ministry of Home Affairs, may be declared as a ‘thana’ for facilitating registration and investigation of cases, it said

Terming the women and children as vulnerable to sexual exploitation, NALSA has recommended among other things a direction by the Supreme Court to the legislature to define term sexual exploitation. …in the interregnum, this court may amplify the definition of sexual exploitation: sexual exploitation includes a situation where a person under coercion and absence of free will is used or abused or explicitly portrayed, either physically or through media in a sexual manner, for the benefit of another person, either through monetary gains, or compensation, or favours, or any arrangements, causing unlawful gain as a result of such act to any person and includes brokering relationships that are coerced, it said.

The NALSA has said there was a strong linkage between trafficking and missing persons. Referring to an apex court judgement, it said, whenever a child goes missing, it should be presumed to be a case of kidnapping or trafficking. It has also suggested that the standard operating procedure, as devised to handle cases of missing children, can be suitably adopted in cases of trafficking of girl child.

This court may issue directions to the government to set up the nodal agency at the national level and state agencies at the state level with the roles as specified in the report, the NALSA has said, adding district task force should also be set up, to be headed by collector, to deal with the menace of trafficking.

Police nexus in trafficking an open secret: DCW chief Swati Maliwal

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Published in The Economic Times

NEW DELHI: Swati Maliwal, recently appointed chief of theDelhi Commission for Women (DCW), says “police nexus” in trafficking of women to Delhi is an “open secret” and says rehabilitating sex workers was on top of her agenda.

Maliwal, who at 30 is the youngest to take charge of this job, had recently equated prostitution with “rape”, drawing the ire of some activists.

Maliwal said that those involved in sex work were mostly doing so because of compulsion, not choice. Providing good career alternatives would enable women to leave sex trade if they so desired, she said in a detailed interview to IANS.

Maliwal, who was a personal aide of Delhi Chief Minister Arvind Kejriwal handling public grievances, said rehabilitating and improving the living conditions of sex workers was on top of her agenda. Free treatment for acid attack victims at Delhi’s top hospitals and government jobs for them was her other focus area.

Maliwal spoke to IANS at her central Delhi office and said she would work to keep DCW “fiercely apolitical”. Edited excerpts:

Amnesty International is planning to declare sex work as a human right. How does this apply to Delhi’s red light area, GB Road?

GB Road is three kilometres from Parliament. But there is no cognizance of the plight of these women. After my visit, a group of sex workers came and said we want to get out of this (sex work). Nirmal Chaya (government-run home for women) is not the alternative. If we rehabilitate 50 women, that would send a message that we are serious about it. There are other issues like how to stop trafficking of minor girls. The moment you enter the area, some pimp approaches you saying baraah saal ki mast, teraah saal ki mast (12-year-old girl, 13-year-old girl).

Those in authority and even police often say off the record that prostitution “prevents rape” of “decent women”. Can a GB Road with its trafficked minors be running without a police nexus?

I strongly condemn this mindset. Most of these girls are being trafficked and in sex work because of poverty. For all those who are saying these things, please realise that this is not social work. Why should we put that moral obligation only on these women? The day I accept this, I will also be in GB Road doing what these women are doing. There is police nexus. It is an open secret. But if you close these brothels down where will these women go? They may get back to sex work in worse conditions.

How do you intercept traffickers with a police force that may not be completely on board?

Trafficking is also taking place in Delhi through placement agencies. DCW is the nodal authority for registering these agencies. We are going to be working on this very soon. We are also trying to increase our presence in GB Road, too. Once that happens, the police will be a little wary about whatever is happening.

How do you intercept traffickers with a police force that may not be completely on board?

Trafficking is also taking place in Delhi through placement agencies. DCW is the nodal authority for registering these agencies. We are going to be working on this very soon. We are also trying to increase our presence in GB Road, too. Once that happens, the police will be a little wary about whatever is happening.

Daring rescue of 21 girls from ‘Kashmir Bazaar’

BY VIJAY SINGH PUBLISHED IN THE TIMES OF INDIA

NAVI MUMBAI: The Navi Mumbai (zone-1) police recently undertook a secret and daring rescue of 21 girls who were pushed into prostitution at Agra’s notorious ‘Kashmir Bazaar’ red light area. Of the 21 girls rescued, five are from Maharashtra state while the rest are from northern states like UP.

All the girls had been either kidnapped or lured by agents while they were barely adolescents aged between 11 to 14 years, and sold for around Rs 2 lakh to 3 lakh at the various 22 ‘kothas’ (prostitution dens’ at Agra’s Kashmir Bazaar area in the last 10 years.

The entire sex scandal came to light recently when a girl kidnapped from Nerul area in 2007 had urged one of her visiting clients in Agra to look for her family back in Navi Mumbai and she was trapped in this sinister world for eight years.

That client, who reportedly is a local goon-turned-Good Samaritan, went back to Agra along with a few of his cronies and successfully helped the Nerul girl escape from that hellhole, after winning the confidence of the pimps in charge of her.

The entire sex scandal came to light recently when a girl kidnapped from Nerul area in 2007 had urged one of her visiting clients in Agra to look for her family back in Navi Mumbai and she was trapped in this sinister world for eight years.

That client, who reportedly is a local goon-turned-Good Samaritan, went back to Agra along with a few of his cronies and successfully helped the Nerul girl escape from that hellhole, after winning the confidence of the pimps in charge of her.

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The Navi Mumbai police team then planned out the entire rescue operation by first doing a though recce of Kashmir Bazaar in Agra. (TOI photo)

“When the victim girl reached Navi Mumbai, she realized that her father had passed away while her ailing mother and a brother were still around. When she told them how she was kidnapped by some woman who gave her some sleep inducing thing to eat, her family approached Nerul police to inform about the status of this missing case,” informed deputy commissioner of police (zone 1) Shahaji Umap. He added that the Nerul girl further informed that cops that there were several more girls from Maharashtra trapped in the infamous 22 ‘koth

“When the victim girl reached Navi Mumbai, she realized that her father had passed away while her ailing mother and a brother were still around. When she told them how she was kidnapped by some woman who gave her some sleep inducing thing to eat, her family approached Nerul police to inform about the status of this missing case,” informed deputy commissioner of police (zone 1) Shahaji Umap. He added that the Nerul girl further informed that cops that there were several more girls from Maharashtra trapped in the infamous 22 ‘kothas’ of Kashmir Bazaar in Agra.

“The pimps would mainly target those juvenile girls who were either having some family problems or other such personal issues. They would either lure them to come and see Taj Mahal in Agra or promise to get them a job. Some other victims, like this Nerul girl were also forcibly kidnapped by first giving them some food laced with sedatives,” added DCP Umap.

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In the process, the cops also arrested three pimps and a female ‘madam’ from that kotha for running this prostitution den in Agra. (TOI photo)

The Navi Mumbai police team then planned out the entire rescue operation by first doing a though recce of Kashmir Bazaar in Agra.

“That red light area is so congested and dirty, that barely a single cycle can pass through that zone. We had to park our bigger vehicle nearly 1 km away and walk towards the designated ‘kotha’ to rescue more such trapped girls.We had to also take assistance from that area’s Inspector General of Police (IGP) RK Mishra,” recalled one of the officers who was part of this rescue op.

He added that they there were advised to finish the rescues within 13 to 15 minutes of time so as to ensure that there is minimum resistance and physical violence for the mafia elements in this area. “The trapped girls were very happy to be rescued. We had to literally pull them out of tiny window openings made in rooms within rooms inside these smelly and cramped ‘kotha’. One of the girls was so eager to be rescued that she jumped from a height and fractured her leg,” recalled the officer.

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The entire sex scandal came to light recently when a girl kidnapped from Nerul area in 2007 had urged one of her visiting clients in Agra to look for her family back in Navi Mumbai. (TOI photo)

The senior inspector of Nerul police station, Sangita S Alphanso, said that there was great danger to the Navi Mumbai police team that had gone to Kashmir Bazaar for this rescue operation. “That place in Agra is infamously known as the bazaar where a girl walks in but can never return. Some of the other locals here told us that only the cops from Mumbai could have done this operation, as there are armed men guarding each prostitution house or ‘kotha’,” said the official.

In the process, the cops also arrested three pimps and a female ‘madam’ from that kotha for running this prostitution den in Agra. Their names are Puja alias Parveen Imran Khan, Shriman Taman (52), JL Birbahadur (25) and Subhash Chandra alias Pappu Babulal (38).

Congratulating the efforts of the zone-1 police team, DCP Umap said that he will recommend them to his superiors for an award. Some of the team officials include Police Inspector Majage, Assistant Police Inspectors Rajput, Hire, Domb, PSIs Bhosale, Shinde, constable Kedar, Police Naik Kadam, Ithape, Londh, Ubale, Salunkhe, Patil, Bhangare, woman police constables Patil, Godse and Kandalkar.

The cops also stated that there may be more such young girls trapped in Kashmir Bazaar from other parts of the country.

Shinde, constable Kedar, Police Naik Kadam, Ithape, Londh, Ubale, Salunkhe, Patil, Bhangare, woman police constables Patil, Godse and Kandalkar.

The cops also stated that there may be more such young girls trapped in Kashmir Bazaar from other parts of the country.

Another big arrest in Tripura trafficking racket

PUBLISHED IN THE TIMES OF INDIA

Agartala: Police arrested a third accused in running a human trafficking racket in the border villages of Tripura based on information from two other accused who were arrested last week.

Delaware Hussein was arrested from Sobhapur village of Sonamura in West Tripura on Saturday.

The two other accused — Kurban Ali, a resident of Indiranagar area of Sonamura and Abdul Rashid Dar, a resident of Kashmir valley — were arrested last week along with 25 Myanmar nationals belong to the Rohingya community from Kurban’s house.

Sub-divisional magistrate of Sonamura Debolina Kilikdar has sent all three accused to five-days police remand.

Superintendent of police (Sepahijala) Pradip Pal said Delaware was arrested based on the information revealed by Ali and Dar while in police custody. They admitted that they had been running a trafficking racket along with a gang in West Bengal. According to police, the detained Myanmar nationals were trapped by the racket in Bangladesh. They were brought to India through the western border to be sold in northern India at a cost of Rs 1 lakh each.

“The women and girls were being sent to brothels while the men were made to join criminal gangs,” a police officer said quoting the confession of the accused persons. They have already sent many people to different parts of India.

The racket has administrative reach in Tripura by which they managed fake passports and sent people outside India. They also admitted that some more Myanmarese were sold through this racket in northern India and Kashmir, police said.

During investigation, police traced a joint account of Kurban Ali with Joel Shikdar, a resident of 24 Parganas of West Bengal in SBI. The account has a record of huge transactions in the past few months

Seven men, eight women and 10 children from Myanmar were sentenced three months jail for illegal entry into the Indian territory. Tripura police is also contacting the Myanmar embassy for their release.

Tripura has reported as many as 13 cases of fake passport rackets in the last one year. In all the cases, passports were processed from different district magistrate offices of Tripura with fake documents. But in none of the cases could police could identify the culprits in the administration.

Photos of cops involved in sex racket released

Published in The Times of India

PUDUCHERRY: The Crime Branch – Criminal Investigation Department of the Puducherry police on Tuesday released photographs of six former policemen, who were allegedly involved in a child prostitution racket, after they failed to surrender despite warnings. The investigation agency sought help from human rights and child rights activists to alert them immediately if they spot these former policemen. Nine former policemen were booked in this case. Three of them — former sub-inspector V Balakrishnan and former police constables M Selvakumar and G Sankar surrendered before the agency on Saturday. They were remanded in judicial custody.

However, six more former policemen — V Yuvaraj and T Sundar, A Anusa Basha, B Kumaravel, G Pandarinathan and V Rajaram did not surrender despite warning, forcing the agency to release their photographs in an effort to nab them. “We released their photographs at 12pm on Tuesday. We are confident of receiving vital information that will lead to their arrest. We will nab them soon. The agency has so far arrested 12 people and rescued four minor girls. These six former policemen are only people wanted in the case. We will file a chargesheet soon and arrest them,” said superintendent of police (CB-CID) S Venkatasamy. The SP did not rule out the possibility of the agency unearthing the involvement of more people in this case.

The agency had earlier announced reward for information leading to their arrest. The SP assured that the identity of the informers will not be revealed.

Police busted a child prostitution racket in May last year following a tip from a child welfare committee and Childline. Police arrested 12 people, including four pimps – K Pushpa, 43 from Thavalakuppam, S Raghu alias Rahman Khan, 29, from Tindivanam, M Manickam, 22, from Anumanthai and S Arul Mary, 73, from Savirirayalu Street and rescued four minor girls. All the accused including the nine former policemen were booked under Sections 4 (punishment for penetrative sex assault), 6 (punishment for aggravated penetrative sex assault) and 16 (abetment of an offence) of the Protection of Children from Sexual Offences (Pocso) Act, and Sections 3 (punishment for keeping a brothel or allowing the premises to be used as a brothel), 5 (procuring, inducing or taking person for the sake of prostitution) and 7 (prostitution in or in the vicinity of public place) of the Immoral Traffic (Prevention) Act and Section 376 (punishment for rape) of the IPC.

Battered and bruised, some return, some are never to be seen again..

180777_10150095433357197_5102103_nBy N Sai Published in the DNA News

In the last of the three-part series, dna travels to remote villages of India’s ‘slavery belt’, some of the remotest and backward areas of Jharkhand. Rescued slaves and the parents of those who have never come back reveal what makes these tribals easy targets

Ranchi: The road to Jahupkokotoli village in the Maoist-hit district of Gumla is a contradiction of sorts. As the two-lane road snakes through the forests and rolling hills of the Chottanagpur plateau, bauxite-laden trucks are the only constant reminder of activity here. Yet the public transport to this part of Jharkhand from the state capital Ranchi is rickety. The only bus everyday is as uncertain as life in this extremely backward region of India. Despite the lack of public transport, thousands of tribal boys and girls from Gumla-Khunti-Simdega region, India’s unofficial ‘slavery belt’, are transported and trafficked to upper middle class and rich homes of Delhi. After a period of enslavement and unpaid forced labour, many return battered and bruised. Some are never to be seen again. Some still carry on.

In Jahupkokotoli, an aboriginal hamlet of 160 Oraon tribal families, 45-year-old Mathoo comes running with a picture of his 14-year-old daughter. “Help me find her. I haven’t seen her after she went away in 2007,” says Mathoo. His daughter would be 21 now, but Mathoo doesn’t know her fate after she was taken by a ‘placement agent’ from a neighbouring village to Delhi to work as a domestic help. Within two months, the agent sent Mathoo Rs 1000 as a payment for his daughter’s ‘services’. Next year, he called up the agent again to inquire about his daughter. “The agent said that my daughter had run away and that he did not know her whereabouts. I do not know whether she is dead or alive,” says Mathoo.

A few houses away from Mathoo’s is the hut of Hari Oraon. His 16-year-old daughter Pramila was taken by an agent to Delhi in early 2014. But she ‘escaped’ within four months and came back. According to her statement to police, Pramila was taken to Delhi by another woman of the same village in the promise of a better life. As soon as she arrived in Delhi she was escorted to a Shakurpur-based placement agency by an agent. They took her finger prints on a piece of paper and sent her to work as a domestic maid at three different homes in Delhi. Facing ill-treatment and not having been paid by any of her employers or the placement agency, Pramila escaped. Lost on the streets in Delhi, she begged another woman to take her home. The woman instead handed her over to the Delhi police. The Delhi police handed her over to a shelter home in the capital from where she was taken to Kishori Niketan, a rehab centre for trafficked women in Bijupara, Jharkhand. Finally in April 2014, she was re-united with her family. For her work as a domestic help in Delhi, Pramila wasn’t paid any money. “The police left her in nearby Bishunpur from where we picked her up and got her home,” says Hari Oraon. “She says she will never go back to Delhi.”

Off the road from Bishunpur lies the Dalit village of Hadiya Toli, literally translating into ‘wine village’. There is no road connectivity to the village and reaching here requires walking a kilometre on a dusty track. The name of 15-year-old Sarita alias Budhni evinces a peculiar response from the village men. “That Dilli-return?”, one asks with a wry smile. “Who knows where she is,” says another. “Ask her mother. She might know.” We find her mother working outside her hut and as the conversation about her daughter nears completion, she says, “Who will marry her now? Who knows what might have happened to her in Delhi?”

Sarita disappeared from her house in 2013 with five other girls after an agent in her village promised her lucrative money in Delhi. Sarita says, “I was promised a monthly wage of Rs 5000. After working four months for an agency in Motinagar in Delhi, I asked for some money. They refused and locked me up instead. I begged to let me go home. But they said I cannot go home before I completed five years. Then one day the police raided the place and they took me in their custody,” says Sarita. She was finally sent home in April 2013.

“There were other girls in that house. I do not know what happened to them. I did not even get the money for my work,” says Sarita. When asked about the nature of her work, Sarita maintains an uneasy silence. Sarita is lucky enough to be back in her village. Even though her village doesn’t have either electricity, drinking water supply or roads, she feels safer here than in any of Delhi’s slave holes.

Phulin Murmu, 18, however doesn’t want to return to her village. Phulin Murmu is not a name that would ring a bell. But when she was found burnt, battered and bitten in a house in South Delhi’s posh Vasant Kunj locality it made national headlines in October 2013. She was found in the house of Vandana Dhir, an executive with a French multinational. Murmu’s body bore hot girdle-induced burn marks, deep scars on the head and bite marks all over her body. She was forced to drink urine, prevented from using the bathroom and confined in the house in a semi-naked condition before being rescued. She was working unpaid for two years before being rescued.

DNA tracked her down at a rehabilitation centre in Khunti, one of the hardest hit districts of the slavery belt. She is being educated and trained at the Mahilya Samkhya Society, which she shares with around 30 other minor girls, many of whom are rescued slaves. Phulin can barely write her name, the scars still show on her face. But she details her three years of enslavement with a brave face and with no emotion. “It is for the first time that I am seeing her talk so openly. It seems she is recovering well from the trauma,” says Asha Kusum, the warden of the institution. The Mahilya Samkhya Society is wary of letting Phulin rejoin her parents in her village. They ask her father to come to town for Christmas. They don’t want to take a chance again. “Most kids are from extremely poor tribal families. Their parents will send them to Delhi for any small amount. Phulin is safe here – from poverty and from agents who would want to prey on her again. She is still scared inside. She will only get better,” says Ms Kusum