नेपाल में मानव तस्करी: देह व्यापार का भारी भूचाल

भूकंप के बाद नेपाल अब मानव तस्करी की मार झेल रहा है

“बइनी, ओ बइनी, कस्तो छ?” (बहन, क्या हुआ?) उत्तर प्रदेश के सोनौली में भारत को नेपाल से अलगाती 66 फुट चौड़ी निर्जन पट्टी के एक किनारे पर टिन की बनी सीसीटीवी युक्त एक छोटी-सी खोली के भीतर से बैंगनी सलवार कमीज पहने एक लड़की आवाज देती है. वह जिसे पुकार रही है, वह लड़की नायलॉन के लाल कपड़े में है और उसकी आवाज को अनसुना किए हुए भारत की ओर भागी जा रही है. लड़की नेपाल के सशस्त्र पुलिस बल के हत्थे चढ़ जाती है. वे पूछते हैं, “कहां जा रही हो? क्यों?” वह कहती है कि उसे भारत में काम मिल गया है लेकिन नहीं पता कि कहां जाना है. बैंगनी कपड़ों वाली लड़की आनन-फानन एकाध कॉल करती है, उसे बताती है कि ऐसा कोई काम वहां नहीं है और उसे वापस उसके घर भेज देती है. वह फिर “ओ बइनी” की आवाज लगाने लग जाती है.

यह लड़की तो बच गई, लेकिन कई ऐसी लड़कियां हैं जो नेपाल से लगी सरहद को चुपके से पार कर जाती हैं. पिछले जून में पुलिस ने महाराजगंज के नौतनवा में एक पेड़ के खोखल में छुपी एक लड़की को पकड़ा था, जो सोनौली से कुछ ही किलोमीटर दूर है. स्थानीय मुखबिरों से मिली सूचना के बाद वे सवेरे से ही उसे भारत और नेपाल की सीमा पर घने जंगलों में खोज रहे थे. कभी झाड़िहिला रहे थे तो कभी लंबी घास को हटा रहे थे और लताओं के नीचे झांक रहे थे. तभी किसी ने टॉर्च जलाई और उस पर नजर पड़ी. वह किसी छोटे से जानवर की तरह अंधेरे में जमी पड़ी थी और उसका चेहरा बुरी तरह घायल था, जबकि उसकी कलाइयों पर रस्सियों के निशान थे. अपने ऊपर पड़ी रोशनी को वह नहीं झेल पाई और अचानक चीखने लगी.

महासंकट  शिकार पर यौन तस्कर
यह चीख एक ऐसे नुक्सान की है जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती. उसकी एक नहीं बल्कि दो त्रासदियां हैं, बिल्कुल अपने देश नेपाल की तरह, जहां 9,000 लोगों को मारने, 28,000 को घायल करने, 28 लाख लोगों को विस्थापित करने और छह लाख लोगों को बेघर करने वाले 7.8 पैमाने के भूकंप के दस हफ्ते बाद तक फैली तबाही का वह महज एक चेहरा हैः उसका गांव रामकोट मलबे में तब्दील हो चुका है, उसका घर खत्म हो चुका है और उसकी मां हमेशा के लिए इस मलबे में गुम हो चुकी है. यह कहानी हालांकि अभी अधूरी है. दसियों हजार महिलाओं की तरह वह भी इंसानी लोभ का शिकार बन चुकी है, जिन्हें उठाया गया, बेच दिया गया और दासता या वेश्यावृत्ति में धकेल दिया गया. उसका देश अब भी बिखरी हुई जिंदगी के टुकड़े समेटने में जुटा हुआ है. दुनिया भर में फैले पाप और बुराई के अदृश्य काले कोठरों में खींच ली गई एक और चीखती हुई मौजूदगी जैसा यह दृश्य है, जहां सारी पहचानें छीनकर, सामाजिक रिश्तों से मरहूम करके जिंदगी को गलाजत और बीमारियों के सहारे कटने को छोड़ दिया जाता है.

संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष की मानें तो नेपाल में बीस लाख औरतें और लड़कियां खास तौर से अरक्षित हालत में हैं. इनमें 14 लाख से ज्यादा भीड़ भरे शिविरों में जी रही हैं और करीब 28,000 लड़कियां ऐसी हैं जिन्होंने अपना परिवार गंवा दिया है और शोषण के गंभीर खतरे का सामना कर रही हैं. बीस हजार से ज्यादा औरतों और बच्चों को मुक्त कराने का दावा करने वाले संयुक्त राष्ट्र के साथ काम कर रहे एक अलाभकारी संगठन मैती नेपाल की अनुराधा कोइराला कहती हैं, “भारी विनाश के बाद पैदा हुई अस्थिरता के चलते अपराधियों को मानव तस्करी का मौका मिल जाता है और वे कमजोर लोगों को बंधक बना लेते हैं.” वे बताती हैं, “मानव तस्करी हथियारों और मादक पदार्थों के व्यापार से भी ज्यादा तेजी से बढ़ रही है. इसके बावजूद उन व्यापारों से उलट जो लोग यहां सेक्स और सस्ते श्रम के लिए मनुष्य को बेचते, खरीदते और इस्तेमाल करते हैं, वे दंड से बच जाते हैं. इस संकट से निपटने के लिए तुरंत कार्रवाई किए जाने और राजनैतिक इच्छाशक्ति की जरूरत है.”

नेपाल के लिए मानव तस्करी कोई नई बात नहीं है. अमेरिकी विदेश विभाग की सालाना मानव तस्करी रिपोर्ट (टीआइपी) कहती है कि हर साल कोई 15,000 लड़कियों को यहां बेचा जाता है. मानव तस्करी पर 3 एंजेल्स नेपाल नाम का एनजीओ चलाने वाले पोखरा के राजेंद्र गौतम कहते हैं, “भूकंप के बाद स्थिति बहुत विकट हो गई है. देश भर में आज रोजाना 40 से 50 लड़कियों को मुक्त कराया जा रहा है. पहले यह संख्या 12 थी.” पश्चिमी एशियाई देश और चीन इस बार तस्करी के नए ठिकानों के रूप में उभरे हैं. अब ऐसा नहीं है कि सिर्फ  शेरपा, तमांग, बादी या चेपांग जैसे गरीब जनजातीय समूहों से आने वाली गोरी चमड़ी और मंगोलियाई चेहरों वाली लड़कियों की तस्करी हो रही है. अब किसी को भी पकड़ा जा सकता है जिसकी उम्र 10 से 40 साल के बीच की हो.

भूकंप के बाद नेपाल की हालत अब भी नहीं सुधरी है. काठमांडू में ह्यूमन राइट्स ऐंड इक्वालिटी में अंतरराष्ट्रीय परामर्शदाता अर्चना तमांग कहती हैं, “अब भी लाशों के ढेर लगे हुए हैं. लगातार आ रहे झटके हमें सतर्क  किए रहते हैं. हमारा देश एक विशाल भयबोध में कैद होकर रह गया है.” वे बताती हैं कि यह स्थिति सिंधुपालचैक, गोरखा, धाडिंग या कावरे में कहीं ज्यादा बुरी है जहां के 90 फीसदी गांव तबाह हो चुके हैं. “लाखों लोग सिर्फ जी रहे हैं. उनके पास कोई विकल्प या सपना नहीं बचा है. वहां तस्कर ज्यादा सक्रिय हैं. जिन लोगों के लिए 500 रुपया खुशकिस्मती की बात है, उन्हें वे 20,000 रु. तक की पेशकश कर रहे हैं.” मानसून की बारिश में बाढ़ और भूस्खलन से बचने के लिए विस्थापित परिवार सुरक्षित ठिकानों और आजीविका की तलाश में आनन-फानन भाग रहे हैं. यही लोग तस्करों के आसान शिकार हैं.

आसान शिकार “सफेद बकरियों” का आना
“मैडम, कुछ सफेद बकरियां आ रही हैं. क्या आप छापा मारना चाहेंगी?” पहले तस्कर रह चुका बाबा, जो अब लड़कियों को छुड़ाने का काम करता है, विनीता को ऐसा कहते हुए भूकंप के तीसरे दिन सतर्क करता है. विनीता लखनऊ में तस्करी के खिलाफ अलायंस नई आशा नाम का एनजीओ चलाती हैं. वे बताती हैं, “जब राहत सामग्री नेपाल पहुंचनी शुरू हुई, कई परेशान मां-बाप अपने बच्चों को भारत ले जाने का आग्रह करने लगे, कुछ ने पैसे जमा कराने की भी बात कही.” इस मौके को सूंघते हुए कोठा मालिकों ने राहत सामग्री देकर तस्करों को वहां भेजना शुरू किया. वे बताती हैं, “भूकंप के कुछ दिनों के भीतर ही लखनऊ के कोठों में नेपाली लड़कियों की संख्या अचानक बढ़ गई.”

दिल्ली में जीबी रोड के कोठा नंबर 64 पर एक स्टिंग अभियान के दौरान तस्करी विरोधी संगठन शक्ति वाहिनी के ऋषिकांत को कुछ संदेह हुआ. यह भूकंप के तुरंत बाद की बात है. उनकी टीम को पता चला कि कोठा मालिक भूकंप पीड़ितों के लिए राहत सामग्री भिजवा रहा हैः चावल के बोरे, दालें, कपड़े. वे बताते हैं, “उस कोठे में सारी नेपाली लड़कियां हैं. वे लोग उनके तबाह हो चुके गांवों में राहत सामग्री लेकर जा रहे थे. पता नहीं उन्होंने ऐसा क्या कहा, लेकिन तबाही वाले इलाके में किसी युवा लड़की को फंसाना आसान हो सकता था.”

गुम जिंदगियां  बेहतर जिंदगी की फांस
उसे कभी नारायणी नाम की एक नदी का पता था जो भारत और नेपाल के बीच चांदी के चमकदार गोटे की तरह बहती थी. उसके किनारों पर लाल फूल होते थे, लहरों पर किंगफिशर तैरते और नीचे घडिय़ाल सोते थे. दूना की पहाडिय़ां विशाल ऊंचाई से इस खेल को निहारती रहती थीं. यह दृश्य 25 अप्रैल को ताश के पत्तों की तरह ढह गया. भूकंप के बाद मलबे में लोगों ने अपने-अपने तंबू गाड़ लिए और वह अपने परिवार के साथ वहां चली आई. जल्दी ही कुछ लोग वहां चक्कर काटने लगे. वे उससे प्यार से बात करते और बताते कि उसे गांव छोड़ देना चाहिए, क्योंकि बाहर की जिंदगी ज्यादा सुहानी है.

आखिरकार किसी ने उसे नशीली दवा खिला दी. शायद कोई पड़ोसी था. उसकी नींद खुली तो वह भारत की सरहद में एक कोठरी में बंद थी. उसे ऊपर की मंजिल पर रखा गया था. उसके हाथ बंधे हुए थे. उन्हें तभी खोला जाता जब उसका बलात्कार करना होता या फिर पीटा जाना होता था. ऐसा करने वाले पुरुषों में कुछ जानने वाले भी थे और कुछ अनजान भी. स्थानीय लोगों को किसी तरह इसकी खबर मिल गई. खतरा सूंघ कर वे लोग भाग गए और लड़की बाहर निकल आई. आज वह काठमांडू के एक “सेफ होम” में है और अपने अधिकारों के लिए लड़ रही है. उसने उन लोगों के खिलाफ मुकदमा किया है जिन्होंने उसकी तस्करी की थी. उसके पेट में बच्चा है और वह उसे पालना चाहती है. वह उसके लिए भी जंग लडऩे को तैयार है. सवाल बस इतना है कि क्या वह दोबारा कभी अपनी खिड़की से बाहर झांककर उस नदी को देख पाएगी.

एक तस्कर की कहानी सुनियोजित तंत्र

मानव तस्करी के दो मामलों में दोषी गहरे वर्ण का और चतुर निगाहों वाला मनोज जमानत पर बाहर आ चुका है. वह पूछता है, “मैं टैक्सी चलाता हूं. मुझे तस्करी के बारे में क्या पता?” उसे फिर पकड़ा क्यों गया? वह कहता है, “बदकिस्मती थी.” पहली बार इसलिए कि उसकी सवारियों में कुछ तस्कर थे और दूसरी बार इसलिए क्योंकि एक एनजीओ के कियोस्क पर कुछ लड़कियों ने गलती से उसकी ओर इशारा कर दिया. वह कहता है, “मैं तो साइकिल से सीमा पार कर रहा था.” उसे अच्छे से पता है कि लड़कियों को सीमा के पार कैसे लाया जाता है. इसमें पांच से छह लोगों की जरूरत होती है. एक आदमी लड़की को गांव से शहर लाता है. एक उसे सीमा तक ले जाता है. एक उसे सीमा से उठाता है. एक उसे बड़े शहर तक पहुंचाता है. वह कहता है, “मैंने यह सब सुना है. मैंने देखा है कि लड़कियां स्वेच्छा से आती हैं. उन्हें नौकरी चाहिए, पैसा चाहिए, वे बाहर जाकर शादी करना चाहती हैं.”

ऋषिकांत कहते हैं, “यह एक दुश्चक्र है.” मानव तस्करी की शुरुआत सामान्यतः गांव में आए किसी नए व्यक्ति से होती है. वह अक्सर ऐसा शख्स होता है जो शादीशुदा, शिक्षित और अच्छी नौकरी वाला हो. लोग उससे मिलते हैं, दूसरे शहरों या देशों में मौजूद अवसरों पर उसकी बातें सुनते हैं और अपनी लड़कियों के लिए अच्छी नौकरियों के प्रस्ताव पर बात करते हैं. नेपाल के राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग द्वारा जारी कैद तस्करों की रिपोर्ट के मुताबिक, अक्सर उनसे यह बात सुनने में आती है कि “मैंने लड़की को उससे प्यार करने के बहाने और अच्छी नौकरी दिलवाने के नाम पर फंसाया.” एक और बात वे कहते हैं, “मैंने उससे या उसके अभिभावकों से संपर्क करने से पहले उसके परिवार की माली हालत का जायजा ले लिया था.”

कोइराला कहती हैं, “लेकिन ये लोग तो तस्करी के तंत्र में सबसे निचले पायदान पर होते हैं और इन्हें सबसे कम पैसे मिलते हैं.” तस्कर जब किसी लड़की को गांव से बाहर लेकर जाता है तो उसकी मदद करने के लिए एक पूरा तंत्र होता है. कोइराला कताती हैं, “ड्राइवर को पता होता है. रास्ते में जिस गेस्टहाउस में वे रुकते हैं उन्हें पता होता है. सीमा पार करने से पहले लड़की के लिए जिन दुकानों से वे नए कपड़े खरीदते हैं, उन दुकानदारों को पता होता है. सीमा के उस पार भी यही चीजें काम करती हैं, जब तक कि वे अपने ठिकाने तक नहीं पहुंच जाते.” हर कदम पर लड़की के साथ एक नया आदमी होता है. “असली अपराधी वे हैं जो इस अपराध के प्रायोजक हैं. वे शायद ही कभी पकड़े जाते हों.”

सोनौली की सीमा चौकी पर अफरा-तफरी का मंजर हैः झोले लादे लड़कों का एक समूह कुछ दूरी पर खड़ा परेशान-सा दिख रहा है और मोबाइल फोन पर बात कर रहा है. एक एनजीओ के कियोस्क के सामने टोपी पहने और चश्मा लगाए एक शख्स किसी का इंतजार कर रहा है. उसके पीछे एक लड़की चुपचाप खड़ी है. चार लड़कियों को लिए हुए एक महिला आगे आती है. तमाम आवाजें एक साथ सुनी जा सकती हैः “हम भारत घूमने जाना चाहते हैं”, “मैं इसका अंकल हूं, इसके लिए मैंने एक नौकरी खोज रखी है”, “मैं अपनी बच्चियों के साथ खरीदारी करने भारत जा रही हूं.”

यह 1950 की एक संधि की देन है कि भारत और नेपाल के बीच 1,751 किलोमीटर लंबी मुक्त सीमा को कोई भी और कभी भी बिना पासपोर्ट के पार कर सकता है. भारत की उत्तरी सीमा की चौकीदारी करने वाले सशस्त्र सीमा बल के महानिदेशक बी.डी. शर्मा कहते हैं, “सीमा पर मानव तस्करी में भारी इजाफा हुआ है.” एसएसबी ने 2008 के बाद से नेपाल से तस्करी के शिकार जिन लोगों को छुड़ाया है और जितने तस्करों को पकड़ा है, उनमें क्रमशः 30 और 49 फीसदी सिर्फ पिछले दो महीनों की घटनाएं हैं. वे बताते हैं, “कुल 26 सीमा चौकियों में से दस उच्च खतरे वाले क्षेत्र हैं, जैसे उत्तर प्रदेश में सोनौली और बिहार में रक्सौल.” यहां सतर्कता बढ़ाने के लिए नेपाल के तस्करी विरोधी एनजीओ को जगह दी गई है. वे कहते हैं, “एनजीओ के कई कार्यकर्ता खुद तस्करी का शिकार रहे हैं, इसलिए वे मीलों दूर से संदिग्धों को सूंघ सकते हैं.”
सोनौली तस्करों के लिए बहुत मुफीद जगह है. यहां मची अफरा-तफरी के बीच अपराधी बिना पकड़ में आए चुपचाप निकल लेते हैं. भारतीय पुलिस के एसएचओ जितेंद्र यादव बताते हैं, “रोजाना करीब दस हजार लोग सीमा के पार आते-जाते हैं और 300 से ज्यादा ट्रक गुजरते हैं.” एक अनुमान के मुताबिक, नेपाली लोग सीमापार भारतीय बाजारों में रोजाना एक करोड़ रु. से ज्यादा की खरीदारी करते हैं.

शर्मा बताते हैं, “तस्कर आम तौर से छोटे वाहनों में सड़क मार्ग से यात्रा करते हैं.” उत्तर प्रदेश में सोनौली और बिहार में रक्सौल के बीच अच्छा संपर्क साधन है. नतीजतन, दोनों जगहें हर किस्म के तस्करों के लिए अहम केंद्र हैं, चाहे वे इंसानों के तस्कर हों या नशीली दवाओं के, नकली मुद्रा के और हथियारों के तस्कर. सोनौली पुलिस का लश्कर-ए-तय्यबा के बम बनाने वालों, इंडियन मुजाहिदीन के नेताओं और दाऊद इब्राहिम के गुर्गों के साथ मुठभेड़ का लंबा इतिहास रहा है. रक्सौल के भी अपने कुख्यात गिरोह हैं और वहां सोने से लेकर नारकोटिक्स, वर्जित माल और हथियारों की तस्करी होती रही है. इसे आइएसआइ के लोगों के लिए भी सुरक्षित ठिकाना माना जाता है.

बिना सुरक्षा वाले प्रवेश बिंदु
तस्करों के लिए डरने की खास वजह नहीं सोनौली में 3 एंजेल्स नेपाल नामक एनजीओ के प्रमुख दीपक भट्टा कहते हैं, “हम सिर्फ आधिकारिक प्रवेश द्वारों पर निगरानी रखते हैं लेकिन तस्कर अनधिकारिक प्रवेश व निकासी बिंदुओं का भी इस्तेमाल करते हैं. सोनौली के आसपास ऐसे 22 स्थान हैं जहां से तस्कर बच कर निकल सकते हैं.” भूकंप से पहले भट्टा की टीम रोजाना 5-6 लड़कियों को छुड़ाने का काम करती थी. आज यह संख्या पांच गुना हो गई है.

नेपाल से तस्करी पर शोध कर चुके राजस्थान विश्वविद्यालय के विनोद कुमार भारद्वाज बताते हैं, “एक ही रास्ते से बार-बार आने-जाने से संदेह पैदा हो सकता है. इसीलिए तस्कर सैलानियों वाले सीजन में आधिकारिक सीमा द्वारों का प्रयोग करते हैं जबकि बीच के वक्त में किसी सुदूर रास्ते का इस्तेमाल करते हैं जहां सुरक्षा इंतजाम न हों.” वे बताते हैं, “एक गिरोह औरतों और लड़कियों को शहरों में लाता है और दूसरे के सुपुर्द करता है.” कुछ लड़कियों को स्थानीय स्तर पर वेश्यावृत्ति में धकेल दिया जाता है और कुछ को बाहर भेज दिया जाता है.

भारत में तस्करी के रास्ते समय के साथ तय हो चुके हैं. पश्चिमी नेपाल से आने वाले सोनौली-महाराजगंज-गोरखपुर का रूट लेते हैं और यहां से कानपुर, लखनऊ, बनारस, आगरा, दिल्ली जैसे बड़े सेक्स बाजारों का रुख करते हैं. मध्य नेपाल से आने वाले जोगबनी और बिहार के रक्सौल का रास्ता लेते हैं जहां से वे पटना जाते हैं या फिर मुंबई जाने वाली जनसाधारण एक्सप्रेस पकड़ लेते हैं. पूर्वी नेपाल से आने वाले तस्कर ठाकुरगंज के आसपास इस पार आते हैं और वहां से सिलीगुड़ी, गुवाहाटी और शिलांग का रुख करते हैं. अपने शोधकार्य के अनुभवों के चलते भारद्वाज का मानना है कि “तस्करों को रास्ते में किसी चीज से खास डरने की जरूरत नहीं होती. यह काम सीमा के दोनों ओर सुरक्षा बलों की सहमति से चलता है.” आधी से ज्यादा लड़कियां स्थानीय सेक्स बाजारों का हिस्सा बन जाती हैं. बाकी दिल्ली, मुंबई, चेन्नै और कोलकाता चली जाती हैं. वहां से उन्हें भारत के किसी और शहर में भेजा जा सकता है या बाहर के देशों में भी, खासकर पश्चिम एशिया के देशों  में और मलेशिया भेजा जा सकता है.

अलायंस नई आशा में छापा मारने की कार्रवाई का नेतृत्व करने वाले आशीष श्रीवास्तव कहते हैं कि किसी तस्कर के लिए लड़की खरीदना महंगा सौदा होता है. वे बताते हैं, “एक लड़की के माता-पिता से दोस्ती गांठने में ही वे 10,000 से 15,000 रु. खर्च कर देते हैं ताकि उनका भरोसा जीत सकें और पैसे की चमक दिखाकर अच्छे जीवन के वादे में उन्हें यकीन दिला सकें.” इसके अलावा उन्हें राजी करने में बिचौलियों की भी भूमिका होती है, जिनमें हरेक को करीब 10,000 रु. मिलते हैं. सीमा पार करने के लिए उन्हें टैक्सी की जरूरत होती है. इसमें भी भरोसे वाला आदमी चाहिए होता है जो हर लड़की पर 3,000 से 5,000 रु. लेता है. इसके बाद तस्कर किसी कोठे पर इस लड़की को 50,000 से 75,000 रु. में बेचने की कोशिश करता है. वे बताते हैं कि पहले साल में वे ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाने की कोशिश करते हैं. वे कहते हैं, “यह बेरहम व्यवस्था है. एक लड़की का कामचलाऊ जीवन बहुत छोटा होता है. अगर वह मारपीट और गालियों से बच गई, एड्स की भेंट नहीं चढ़ी या मारी नहीं गई, तब जाकर बीस साल की उम्र के बाद वह खुद तस्कर बन सकती है.”

जाल और चाल नए तरीके, नए ठिकाने
सोनकलिया को रोकने वाली कोई सीमा नहीं बनी है. उससे आप कुछ भी पूछकर देखें, वह तुरंत अपने छह पहचान पत्र दिखा देगी. सारे इतने अलहदा हैं कि वह हर बार नई नजर आएगी. एक पहचान पत्र कहता है कि वह बनारस की फैशन परिधान वाली कंपनी विन-विन की कर्मचारी है. दूसरे में वह सामुदायिक रेडियो परिवर्तन 89 मेगाहर्ट्ज की पत्रकार है. एक तीसरा पहचान पत्र उसे कपिलवस्तु मल्टीपल कैंपस की छात्रा बताता है. उससे पूछिए कि विन-विन में वह क्या काम करती है जिससे उसे 27,000 रु. महीने की आय होती है, तो उसका जवाब होगा, “मैं ट्रेनिंग देती हूं.” कौन-सी ट्रेनिंग, किसे? वह दोहराती है, “मैं ट्रेनिंग देती हूं.” और उसके साथ चुपचाप खड़ी दूसरी लड़की कौन है? “ मेरी बहन है, गीता. मैं उसे विन-विन में नौकरी लगवाने लेकर जा रही हूं.” एक नजर में कोई भी पक्के तौर पर सोनकलिया के बारे में इतना ही बता सकता है कि वह झूठ बोल रही है.

तस्करों ने ऐसी पहचानों के लिए अब फैशन, मॉडलिंग, डांसबार, मसाज पार्लर, वयस्क मनोरंजन जैसे तमाम क्षेत्रों को पकड़ लिया है. सोनकलिया का विन-विन वाला जो फर्जी “प्रिविलेज कार्ड” है, उस पर न तो कोई पता है, न ही कोई विवरण. बस एक पंक्ति लिखी है, “वी आर द टीम.” एक एनजीओ की कार्यकर्ता माया की मानें तो सोनौली सीमा चौकी पर पकड़ी जाने वाली करीब 30 फीसदी लड़कियां कहती हैं कि वे विन-विन के लिए काम करती हैं. किसी को नहीं पता कि ये विन-विन वास्तव में क्या है. वे बताती हैं, “वे सभी कहती हैं कि वे बनारस में एक डॉरमिटरी में रहती हैं.” ऐसा लगता है कि इन्हें भारी तनख्वाहें मिलती हैं. अगर एक लड़की तीन और लड़कियों को ले जाने में कामयाब हो जाती है तो उसे कमिशन मिलता है. इस धंधे में हर नई रंगरूट को पंजीकरण कराने के लिए 25,000 रु. खर्च करने पड़ते हैं.

एक और अजीब मामला तब सामने आया जब नेपाल के सेंट्रल इन्वेस्टिगेशन ब्यूरो (सीआइबी) ने जून में काठमांडू के दस से ज्यादा तस्करों को गिरफ्तार किया. ये लोग डांस बारों के चक्कर लगा रहे थे और अपनी मॉडलिंग एजेंसियों के लिए फोटोशूट का बहाना बनाकर लड़कियों को बाहर ले जाने के लिए बहकाने में लगे थे. इनमें अधिकतर का पैसा पश्चिमी एशिया और अफ्रीका के डांस बारों में लगा हुआ था, जहां लड़कियों की तस्वीरें भेजी जा रही थीं और एक के बदले में 3,000 डॉलर की मांग की जा रही थी. सीआइबी ने पाया कि एक बार वहां पहुंचने के बाद इनके यात्रा दस्तावेजों को जब्त कर लिया जाता था और इन्हें वयस्क मनोरंजन तथा सेक्स के धंधे में धकेल दिया जाता था. कई को तो मारा-पीटा भी गया, अलग रख दिया गया और कैद कर दिया गया.

अब तस्करी का बाजार भी बदल रहा है. भारत अब मुख्य बाजार नहीं रहा. टीआइपीएस की रिपोर्ट कहती है कि भारी संख्या में लड़कियों को तस्करी करके पश्चिमी एशिया, मलेशिया, हांगकांग, दक्षिणी कोरिया, जापान और यहां तक कि अफ्रीका और स्वीडन तक भेजा जा रहा है. वयस्क मनोरंजन और यौन शोषण के एक अहम केंद्र के रूप में चीन उभरकर सामने आ रहा है. एक अन्य हालिया छापे में सीआइबी ने एक मैरेज ब्यूरो का भंडाफोड़ किया था, जो किशोरियों को अधेड़ चीनी पुरुषों के साथ “कागज पर शादी” करवाने के लिए फंसाता था. ये चीनी विदेशी दुलहन के लिए 15 से 25 लाख रु. चुकाने को तैयार थे. लड़कियों को बताया जाता था कि शादी तो बस नाम की है, जबकि उन्हें भारी वेतन पर एक कंपनी में काम करना होगा जिसकी मदद से जल्द ही वे अपने परिवार को चीन ले जा सकेंगी. जांच में पता चला कि काठमांडू के इर्दगिर्द ऐसे कम से कम 83 ब्यूरो काम कर रहे थे.

नियुक्ति और शिक्षा का फर्जीवाड़ा मानव तस्करों की नई चाल है. ऐसे सिलसिलेवार मामले सामने आए हैं जहां नेपाली छात्रों ने विदेशी विश्वविद्यालय में प्रवेश के लिए भारी धन चुकाया है और खुद को अंत में ऐसी खतरनाक स्थितियों में फंसा पाया जहां से निकलना असंभव था. मानव अंगों के व्यापार और वैश्विक आतंकी समूहों के इर्दगिर्द भी एक खतरनाक नेटवर्क  कायम हो रहा है. एशिया फाउंडेशन की रिपोर्ट है कि कावरे के गरीब ग्रामीणों की किडनी निकाल ली गई, जिसे करोड़ों रु. में चेन्नै और दिल्ली के काले बाजार में बेचा जाएगा. नेपाल की सीआइबी ने ऐसे गिरोह का पर्दाफाश किया है जो 7,000 डॉलर की दर से नेपाली औरतों को सेक्स और इंसानी ढाल के लिए सीरिया में खतरनाक इस्लामिक स्टेट मिलिशिया को बेचता था.

मासूमियत का अंत बच्चे भी नहीं बख्शे जा रहे
ललितपुर में कैफे आमू नाम का अपना रेस्तरां चलाने वाली अर्चना तमांग को काम के दौरान यह एहसास हुआ कि बच्चों को भी नहीं बख्शा जा रहा है. वे बताती हैं, “भूकंप के तुरंत बाद हमने एक अनाथालय में हर शनिवार खाना भेजने का फैसला किया.” कुछ हफ्तों में ही उनका ध्यान इस बात पर गया कि बच्चों की संख्या नाटकीय तरीके से घट-बढ़ रही है. उनके एक दोस्त हैं शशांक सादी, जो आपदा प्रबंधन के बांग्लादेशी विशेषज्ञ हैं. उनका भी यही निष्कर्ष था कि अपंजीकृत बालगृहों में ऐसा कुछ घट रहा है. सादी ने इस पर नेपाल के केंद्रीय बाल कल्याण बोर्ड से परामर्श किया. आज बच्चों को अनुमति या माता-पिता के बगैर कहीं ले जाने पर राष्ट्रव्यापी प्रतिबंध लग चुका है.

भूकंप से अस्सी लाख बच्चे प्रभावित हुए हैं. करीब साढ़े नौ लाख बच्चे या तो सड़कों पर हैं या फिर अस्थायी तंबुओं के भीतर हैं. कम से कम 245 को तस्करों के चंगुल से या बालगृहों के भीतर गैर-कानूनी रूप से रखे जाने से छुड़ाया जा चुका है. बच्चा गोद लेने या अनाथालयों में जाने में दिलचस्पी रखने वाले विदेशियों के प्रति यूनीसेफ ने “ऑर्फनेज वॉलन्टूरिज्म” की चिंता जाहिर की है. हाल ही में पुलिस ने तीन बच्चों को मुक्त कराया जिन्हें गोद लेने के नाम पर एक चीनी महिला सिंधुपालचौक से तस्करी करके पोखरा ले जा रही थी.

लंबी राह कई हितधारकों का सवाल

शक्ति वाहिनी के केंद्रीय गृह मंत्रालय को लिखे पत्र के बाद कुछ कार्रवाई हुई है. उत्तर प्रदेश के गृह विभाग ने सीमा पर सतर्कता बढ़ा दी है. तस्करों के लिए सीसीटीवी कैमरे लगाए गए, तस्कर निरोध इकाइयों को सक्रिय किया गया, पुलिस के लिए जागरूकता कार्यक्रम चलाए गए और ऐसे नेटवर्क का निर्माण किया गया जहां मानव तस्करी निरोधक सभी हितधारकों को इकट्ठा किया जा सके. उत्तर प्रदेश के गृह सचिव कमल सक्सेना कहते हैं, “हम कुछ समय से इस मसले पर काम कर रहे हैं और मुख्यमंत्री खुद इसमें निजी दिलचस्पी ले रहे हैं.” अभी और भी योजनाएं बाकी हैं. तस्करी निरोधक कानूनों पर छोटी लेकिन दमदार पहल से लेकर पीड़ितों के लिए पुनर्वास और कौशल विकास के प्रयास. सक्सेना ने बताया, “उत्तर प्रदेश आगे बढ़ चुका है, इसलिए अब तस्कर बिहार और बंगाल का रुख कर रहे हैं. हमारा मॉडल दूसरे राज्य भी अपना सकते हैं.”

नेपाल की संविधान सभा के सदस्य विश्वेंद्र पासवान कहते हैं, “अधिकतर तस्करों को हमारे नेताओं का संरक्षण प्राप्त है. वे हमारे राजनैतिक दलों और नौकरशाहों के लिए काम करते हैं और उनसे पोषित होते हैं. ऐसे में तस्करी की समस्या से निपटने में नेपाल क्या उम्मीद कर सकता है?” कोइराला का कहना है कि समस्या यह है कि इसमें कई हितधारक शामिल हैं. वे कहती हैं, “नेपाल की सरकार, गृह मंत्रालय, कानून मंत्रालय और न्यायपालिका शानदार काम कर रहे हैं. लेकिन जब तक महिला और समाज कल्याण मंत्रालय तथा विदेशी रोजगार मंत्रालय नहीं जुड़ जाते, खामियां दुरुस्त नहीं की जा सकेंगी.”

गोरखपुर परिक्षेत्र के पुलिस महानिरीक्षक अमिताभ यश कहते हैं, “अब गुटखा चबाने वाले अशिक्षित पुरुष-महिलाएं तस्कर नहीं रह गए हैं. वे सेलफोन लेकर चलते हैं, अंग्रेजी बोलते हैं और हो सकता है कि वे अपनी बिरादरी के सम्मानित जन हों.” इस बात के साक्ष्य हैं कि आज तस्कर सूचनाओं के आदान-प्रदान के लिए, दुनिया भर में पैसे और सेवाओं के तीव्र विनिमय के लिए स्मार्ट प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल कर रहे हैं. वे कहते हैं, “तकनीक भी समाधान का हिस्सा हो सकती है, खासकर बायोमीट्रिक्स, उंगलियों के निशान, रेटिना का स्कैन, आवाज-चेहरे की पहचान.” भारत का विशिष्ट पहचान प्राधिकरण इस साल देश के बाल गृहों के साथ बायोमीट्रिक्स प्रणाली की शुरुआत कर रहा है ताकि लापता बच्चों का पता लगाया जा सके और तस्करी और गैर-कानूनी तरीके से गोद लेने को रोका जा सके.

इस दौरान नेपाल से लड़कियां अब हवाई जहाज से बाहर जा रही हैं. इंटरपोल ने ऐसी  चेतावनी जारी की है. काठमांडू हवाई अड्डे पर जींस और छोटे टॉप पहने कुछ लड़कियां सुरक्षा जांच तक आती हैं. उनके कदमों में तेजी है, चेहरे पर मुस्कान है और हाथ में एयरएशिया के बोर्डिंग पास हैं. उनसे पूछिए कि वे कहां जा रही हैं, और वे एक साथ चहक उठती हैं, “मलेशिया.” क्यों? “हमें नौकरी मिल गई है.” उनसे कंपनी का नाम पूछिए तो वे एक दूसरे की ओर देखकर हकलाने लग जाती हैं, “प्रेसी… प्रेसे…!” फिर एक लड़की मामले को संभालती है, “वह मोबाइल पैकेजिंग कंपनी है.” हो सकता है ऐसा ही हो, लेकिन यकीन करना मुश्किल है.

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