'जीबी रोड' को मान्यता नहीं, पहचान चाहिए

MEETING WITH THE WOMEN IN PROSTITUTION ON PREPARING THE RESPONSE TO THE SUPREME COURT ORDER ON REHABILITATION

MEETING WITH THE WOMEN IN PROSTITUTION ON PREPARING THE RESPONSE TO THE SUPREME COURT ORDER ON REHABILITATION

मंजरी चतुर्वेदी ॥ नई दिल्ली   NABHARAT TIMES
उन्हें अपने पेशे के लिए कानूनी मान्यता नहीं चाहिए। बल्कि उन्हें चाहिए एक ऐसी पहचान, जिससे वे इस समाज-देश का हिस्सा बन सकें। साथ ही, उन्हें चाहिए रोजी-रोटी कमाने और सिर ढकने का एक इज्जतदार आधार। अपनी इसी मांग को लेकर जल्द ही वे सुप्रीम कोर्ट जाने का मन बना रही हैं। जी हां, यह फैसला किया है दिल्ली के रेड लाइट एरिया जीबी रोड में रहने वाली 60-65 सेक्स वर्कर्स ने, जिन्होंने एक एनजीओ के माध्यम से अपना हलफनामा सुप्रीम कोर्ट में पेश करने का मन बनाया है। इनमें 18 साल से लेकर 60 साल तक की महिलाएं शामिल हैं।

पं. बंगाल के रेड लाइट एरिया में हुई एक सेक्स वर्कर की हत्या के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने संज्ञान लेते हुए संविधान की धारा 21 (जीने का अधिकार) के तहत केंद्र सरकार व देश भर की राज्य सरकारों को सेक्स वर्कर्स को सशक्त करने के लिए योजनाएं बनाने का आदेश दिया। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि उन योजनाओं के तहत उन्हें वोकेशनल ट्रेनिंग देने के साथ-साथ रोजगार देने की व्यवस्था हो। साथ ही, कोर्ट ने यह हिदायत भी दी कि इन वर्कर्स द्वारा तैयार उत्पादों को बाजार उपलब्ध कराने व उनके रिहाइश की जिम्मेदारी भी सरकार की होगी। कोर्ट ने 4 मई तक केंद्र व राज्य सरकारों से इस संबंध में उनके जवाब मांगे हैं।

फिलहाल जीबी रोड की तमाम सेक्स वर्कर्स बेसहारा, पीडि़त व शोषित महिलाओं के लिए काम करने वाली एनजीओ ‘शक्तिवाहिनी’ के साथ मिलकर अपने अधिकारों की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा देने का विचार बना रही हैं। हलफनामे के माध्यम से ये जानना चाहती हैं कि सरकार उनके लिए क्या कर रही है। वे कोर्ट को यह बताना भी चाहती हैं कि वे खुद क्या कर सकती हैं और उसके लिए उन्हें सरकार से क्या मदद चाहिए। गौरतलब है कि पिछले दिनों दिल्ली सरकार ने सामाजिक रूप से बेहद कमजोर व अति असुरक्षित (वलनरेबल) लोगों का पता लगाने के लिए एक सर्वे कराया, जिसमें जीबी रोड की सेक्स वर्कर्स को शामिल किया गया। सर्वे के आधार पर इन्हें समाज में ‘अकेली’ व ‘परित्यक्त’ महिला के तौर पर चिह्नित किया गया।

चाहिए बस एक रास्ता …
जीबी रोड में रह रहीं इन महिलाओं के नाम और चेहरे भले ही अलग – अलग हों , लेकिन इनकी तकलीफें और संघर्ष कमोबेश एक जैसे ही हैं। सुप्रीम कोर्ट में अपनी आवाज उठाने के लिए जुटीं इन महिलाओं से हुई बातचीत में ज्यादातर ने माना कि इनके परिवारवालों , यहां तक कि बच्चों तक को नहीं पता कि ये लोग अपनी देह बेचकर रोजी – रोटी कमाती हैं। ज्यादातर के अनुसार , इनके घरवालों को पता है कि दिल्ली में ये लोग छोटी – मोटी नौकरी कर अपना पेट पाल रही हैं। इनमें से ज्यादातर के बच्चे हॉस्टलों में रहकर पढ़ रहे हैं। कुछ के बच्चे दिल्ली में हैं , तो कुछ के दिल्ली के बाहर। बढ़ती उम्र के चलते 50 वर्षीया लाजी को कोठा छोड़ना पड़ा। अब लाजी रेड लाइट में काम करने वाली एक एनजीओ के साथ जुड़कर महीने के 3,000 कमाती है , जिससे वह अपनी दो बेटियों को पढ़ा रही है। लेकिन बावजूद इसके वह सड़क पर रहती है , जबकि उसी की हमउम्र रेशमा को अपनी दो जवान बेटियों के घर बसाने की चिंता है। पैसे की तंगी के चलते वह इस जिम्मेदारी को पूरा नहीं कर पा रही।

इनमें से ज्यादातर महिलाओं की मांग थी कि इन्हें बीपीएल राशन कार्ड या मतदाता पहचान पत्र उपलब्ध कराए जाएं , ताकि सामाजिक रूप से इनकी पहचान या अस्तित्व साबित हो सके सके। एक बच्चे की मां मालिनी का कहना था कि हम तो बैंक अकाउंट तक नहीं खोल सकते। बच्चे को पैसे भेजने में काफी दिक्कत आती है। इनका दर्द है कि इन्हें सिर्फ समाज , व्यवस्था और पुलिस – प्रशासन से ही प्रताडि़त नहीं होना पड़ता , बल्कि कई बार इनके ग्राहक भी शोषित करने से बाज नहीं आते। कुछ महीने पहले 35 वर्षीया सान्या को उसका ग्राहक कोल्ड ड्रिंक में कुछ मिलाकर उसके कई लाख के गहने लेकर चंपत हो गया। लेकिन पुलिस की बेरुखी की वजह से वह रिपोर्ट नहीं लिखा पाई। अब इन महिलाओं ने एकसुर में कहा कि वे इस अंधेरी जिंदगी से बाहर निकलने के लिए पूरी तरह से तैयार हैं। बस उन्हें एक रास्ता और हौसला चाहि ए।

http://navbharattimes.indiatimes.com/delhiarticleshow/7851628.cms

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